भारत में वृद्ध: उसके सामाजिक-आर्थिक तथा स्वास्थ्य निहितार्थ

भारत के बुजुर्ग पुरुषों की दो-तिहाई आबादी और बुजुर्ग महिलाओं की 90-95 फीसदी आबादी निरक्षर है और उनकी बड़ी संख्या, विशेषकर महिलाएं अकेली है। इसलिए आर्थिक निर्भरता का स्तर काफी ऊंचा है। एक अनुमान के मुताबिक 1 करोड़ 80 लाख बुज़ुर्ग पुरुष तथा 3 करोड़ 50 लाख बुज़ुर्ग महिलाओं को वर्ष 2001 में नौकरी की जरूरत होगी।

यह आंकड़ा वर्तमान में कार्यरत लोगों के आधार पर निकाला गया है। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में उनके लिए नौकरी के सृजन के लिए बड़े स्तर पर संसाधनों की जरूरत होगी। इसके अलावा 5 करोड़ 50 लाख बेरोजगारों को सहारा देने के लिए वित्तीय आपूर्ती की भी जरूरत होगी, विशेषकर तब जब इनमें से ज्यादातर के पास पर्याप्त बचत राशि या पारिवारिक सहायता उपलब्ध नहीं है।
यह भी अनुमान लगाया गया है कि करीब 2 करोड़ 70 लाख बुज़ुर्ग व्यक्ति वर्ष 2001 में किसी भी समय बीमार पड़ेंगे और उनके लिए विशेष चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ेगी। ऐसी चिकित्सकीय सहायता के अभाव में उनकी जरूरतों की पूर्ति के लिए आधारभूत संरचना पर बड़ी राशि खर्च करनी होगी।
विकलांगता से ग्रस्त होना भी आयु बढ़ने की प्रक्रिया का एक अहम पहलू है। वर्ष 2001 में भारत में करीब 1 करोड़ 70 लाख विकलांग होंगे जिनमें से आधे को दृष्टि से संबंधित विकलांगता होने की संभावना है। ऐसे लोगों की एक बड़ी आबादी काम करने में असमर्थ होगी। इस प्रकार वे आर्थिक रूप से दूसरे पर निर्भर होंगे। पारिवारिक सहारे के अभाव में उन्हें सरकार से मदद की उम्मीद होगी। भले ही राज्य सरकार एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने विकलांगों या अतिगरीबों की कुछ वित्तीय सहायता की योजना चालू की है पर ऐसे पेंशन की राशि 30 से 60 रुपए प्रति माह ही है। इसके अलावा फंड की उपलब्धता की कमी के कारण इस पेंशन योजना के तहत कुछ लोग ही आ पाते हैं।    
भारत में बुज़ुर्गों की बेहतर स्थिति को बढ़ावा देने वाले सकारात्मक पहलुओं में एक परिवार के सदस्यों का उनके साथ गहरा जुड़ाव है। ऐसे लोग जो अपने बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी नहीं उठा पाते उनपर सामाजिक दवाब बना रहता है। इसलिए इन मूल्यों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण हो जाता है। परिवार के बुज़ुर्गों को मानव संसाधन के तौर पर देखा जाना चाहिए तथा उनके समृद्ध अनुभवों का उपयोग देश की ज्यादा से ज्यादा विकास में करना चाहिए। सरकार द्वारा उनके स्वस्थ एवं सार्थक जीवन की क्षमता को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।      

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी)

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम की शुरुआत 15 अगस्त 1995 को हुई। यह संविधान के अनुच्छेद 41 एवं 42 के ‘नीति-निर्देशक तत्वों के अनुपालन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कार्यक्रम गरीब परिवारों में वृद्धावस्था, जीविकोपार्जन करने वाले मुख्य सदस्य की मृत्यु तथा मातृत्व जैसी स्थितियों में लाभ पहुंचाने के लिए सामाजिक सहायता की एक राष्ट्रीय नीति प्रस्तुत करता है। इस कार्यक्रम के तीन अंग हैं, जिनके नाम हैं:

  • राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (एनओएपीएस)
  • राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (एनएफबीएस)
  • राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (एनएमबीएस)

कई क्षेत्रों से मिले परामर्श तथा राज्य सरकारों से मिली प्रतिक्रिया के बाद वर्ष 1998 में इन योजनाओं में आंशिक सुधार किया गया। वर्तमान सुधारों के बाद इन योजनाओं की मुख्य विशेषताएं निम्न हैं: 

राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना
इस योजना के अंतर्गत निम्न शर्तों के अनुसार केंद्रीय सहायता उपलब्ध है:

  • आवेदनकर्ता (पुरुष या महिला) 65 वर्ष या इससे ज्यादा उम्र के हों।
  • ऐसे आवेदनकर्ता जो अपने जीविकोपार्जन के स्रोतों या परिवार अथवा दूसरे स्रतों से मिलने वाली अल्प आर्थिक सहायता या अनियमित रोजगार साधनों पर निर्भर करता/करती हो, ‘दरिद्र’ की श्रेणी में आएगा/आएगी।
  • केंद्रीय सहायता के दावे के लिए वृद्धावस्था पेंशन की राशि 75 रुपए प्रतिमाह है।


स्रोत : एजिंग इन इंडिया: इट्स सोसियोइकोनोमिक एंड हेल्थ इंप्लीकेशन्स- एच बी चानन एंड पी पी तलवार, एशिया पेसिफिक पोपुलेशन जर्नल, Vol 2, नं.337





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