शिक्षा की ओर प्रवृत करने की पहल
बहु-प्रतिभा सिद्धांतः क्या है आपके सीखने की
शैली
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भारत में एमवी फाउंडेशन (गैर सरकारी संस्था,
आँध्र प्रदेश) ने बालिका शिशु श्रम को रोकने की दिशा में एक विशिष्ट
दृष्टिकोण विकसित किया है। इसके माध्यम से यह संस्था बँधुआ मजदूरी और
बाल-श्रम के विरुद्ध जन समुदाय एवं सरकारों को उत्प्रेरित करने का भी
कार्य कर रही है। घरेलू और बँधुआ मज़दूरों तक पहुँचने और उसे स्कूल तक
लाने में बालिका शिशु शिक्षा कार्यक्रम ने कई नवीन एवं उत्तम पद्धतियाँ
विकसित की है।
इसने नागरिक समुदाय के पारंपरिक सोच और
सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी है। बालिकाओं को शिक्षा पाने के अधिकार के
तहत महत्वपूर्ण पणधारियों (लेख्य या ठेके) को उपलब्ध कराए जा रहे शिक्षा
कार्यक्रम से उस तक पहुँच की रुकावट को दूर करने एवं उसके संरक्षण के लिए
नवीन मार्ग प्रशस्त किया है। इसने लोगों के बीच बालिकाओं को मजदूरी के
कार्य से हटाकर स्कूल भेजने के प्रति एक बेहतर समझ भी पैदा की है।
बालिका शिशु श्रम के मुद्दे पर सामुदायिक
सक्रियता ने इसे निजी मुद्दा से हटाकर सार्वजनिक मुद्दा बना दिया है। इस
मुद्दे पर सामुदायिक बैठकों में भी गंभीर चर्चा हुई है। इसके अलावे,
स्कूली शिक्षा समिति बालिकाओं के लिए जरूरी शौचालय एवं सुरक्षा
की जरूरत को पूरी करने के लिए स्कूल के स्तर में सुधार की पहल की है। उनके
अनुसार स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित बालिका शिशु कार्यकर्त्ता, जिन्हें
शिक्षा प्राप्त करने के दौरान होने वाली इस प्रकार की असुविधा का अनुभव
है, बालिकाओं द्वारा सामना किये जा रहे इस तरह की समस्याओं को बेहतर ढंग
से पहचान कर सकती है। उन्होंने गहनतापूर्वक घर-घर जाकर बालिका शिक्षा के
प्रति अभियान चलाया। इसके परिणामस्वरूप 11 बालिकाओं के माता-पिता ने अपनी
बेटी से काम कराना बंद कराकर उन्हें स्कूल भेजने का फैसला किया।
इसने अपने कार्यकर्त्ताओं को गैर
गतिरोधात्मक कौशल के बारे में प्रशिक्षण दिया कि वे बालिका शिक्षा को
बढ़ावा देने पर तब-तक बल दिया जाए जब-तक कि बालिका शिक्षा के विरोधी
माता-पिता इस बात को मान नहीं लेते। एक बार माता-पिता बालिका शिक्षा के
प्रति तैयार हो जाते है तो छोटी लड़कियों को स्कूल में तथा बड़ी लड़कियों
को आवासीय विद्यालयों में नामांकन कराया जाता है। उन्होंने पहले पढ़ाई
छोड़े हुए बच्चों का निरीक्षण किया, बाद में काम करने वाली बालिकाओं की
पहचान की। अनुभवों के आदान-प्रदान और एक-दूसरे को सहायता देने जैसी
गतिविधियाँ महिला कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और प्रेरित करने का कार्य
करती है। ये बालिकाएँ अपने माता-पिता तथा समुदाय के लिए सकारात्मक रोल
मॉडल बन गई हैं। यहाँ तक कि उन्होंनें बाल-विवाह पर भी प्रकाश डाला है जो
कि गाँवों में एक गंभीर समस्या है। बालिका कार्यकर्ताओं को इस बात के
लिए भी प्रशिक्षित किया गया है कि हर सार्वजनिक मंच से महिला मुद्दों
और बालिकाओं के अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की जाए। इसके लिए
आधारभूत संरचना को विभिन्न समितियों (बालिका शिशु अधिकार संरक्षण व माता,
पढ़ाई कर रही बालिका एवं युवा बालिका समिति) के माध्यम से जान-बूझकर कम और
ग्रामीण समुदाय में केन्द्रित रखा गया है जो बालिका श्रम के खिलाफ समाज
में जागरूकता लाने को प्रतिबद्ध है। इसके प्रति समाज में जागरूकता लाने के
लिए नुक्कड़ नाटकों का सहारा लिया गया। इसका असर यह हुआ कि माता-पिता अपनी
बेटी को बँधुआ मजदूरी से हटाकर उसे स्कूल व आवासीय विद्यालयों में दाखिला
कराने लगे। साथ ही, इससे स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में गिरावट
आई व स्कूल में नामांकन कराने वालों की संख्या में वृद्धि हुई। इसके
अलावे, माता-पिता और अभिभावकों से बातचीत करके कई बाल-विवाहों को भी रद्द
कराया जा सका। आज एमवी फाउंडेशन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाल
श्रम के उन्मूलन हेतु इस मॉडल को प्रस्तुत करने में सक्षम है और इस
क्षेत्र में उसने कई सफल उदाहरण भी प्रस्तुत किया है।
स्रोत :
यूनेस्को
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शिक्षा के
अधिकार पर नई संयुक्त राष्ट्र प्रतिवेदन
प्रतिवेदन खुद को विकलांग व्यक्तियों के साथ जोड़ता है और शिक्षा को शामिल
करने के लिए संगठित प्रयास का आह्वान करता है। यूनेस्को से बड़ा इनपुट
मिलने के साथ यह सामान्य ढांचा, निगरानी और कार्यान्वयन की विभिन्न
चुनौतियों को खत्म करती है।
महाराष्ट्र के
स्कूलों में नामांकन अभियान ने जोर पकड़ा
सर्व शिक्षा अभियान के एक भाग के रूप में वसंत पुर्के (महाराष्ट्र के
शिक्षा राज्यमंत्री) तथा यूनीसेफ के सहयोग से यवतमाल जिले में एक जन
अभियान चलाया गया, जिसमें पालकों से उनके बच्चों को स्कूल भेजने का आग्रह
किया जा रहा है। यह अभियान ध्यानरथ परिक्रमा के रूप में चलाया जा रहा है,
जो स्कूल में नामांकन कराने का संदेश लेकर गांव-गांव में घूम रहा
है।
कोलकाता की
सड़कों पर हरेक बच्चे की गणना
कोलकाता नगर निगम, सरकारी विभागों, यूनीसेफ और गैर सरकारी
संस्था कोलकाता के वंचित वर्गों में पैदा हुए बच्चों को जन्म
प्रमाण-पत्र जारी करने के लिए एकजुट हुए हैं ताकि उन्हें स्वास्थ्य और
शिक्षा सेवाओं तक की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके और शोषण के खिलाफ
उन्हें संरक्षण मिल सके।