गर्भ-निरोध

गर्भ-निरोध का अर्थ है- सोच विचार कर गर्भ-धारण न होने देना।  गर्भ-धारण तभी होता है जब अंडा वीर्य से मिलता है और युग्मनज (जाइगाट) (वीर्य और अंडों के मिलने पर तैयार उत्पाद) गर्भाशय के संस्तर से जुड़ जाता है और फिर वहीं से वह बढ़ने लगता है।  इसी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए गर्भ को रोकने के लिए मूलतः निम्नलिखित पांच उपाय अपनाये जा सकते हैं :

  • सबसे आम तरीका है - संभोग न किया जाए। इस पद्धति में लिंग को योनी से उस समय संपर्क में न लाया जाए जब स्त्री उर्वरक चक्र में हो।  (लय पद्धति, उर्वरक जागरुकता पद्धति)
  • सबसे आसान तरीका है वीर्य को अंडे से न मिलने दिया जाए।  इसके कई तरीके हो सकते हैं। (पुरुष और स्त्री के कंडोम, डायाफ्राम और सर्वाइकल कैप)। इसकी स्थायी पद्धति है-नस बंदी (पुरुष बंध्याकरण) और टुबुल लिगेशन (स्त्री बंध्याकरण)।
  • तीसरा तरीका है कि स्त्री को अंडे जनने न दिया जाए और/या पुरुष को वीर्य उत्पन्न करने न दिया जाए। इसके उदाहरण हैं- हारमोनल पद्धति जैसे- खाने वाली गर्भ निरोधक गोलियां, त्वचा के नीचे गोलियाँ रखना या प्रतिरोपण।  इस कोटि में गैर उर्वरक इंजेक्शन भी आते हैं जिसे पुरुष और महिला दोनों के लिए तैयार किये जा रहे हैं।
  • इसका एक और तरीका है कि उर्वरक अंडों (जाइगाट) को गर्भाशय के संस्तरों से जुड़ने न दिया जाए।  इसका एक उदाहरण है- इंट्रा-यूट्रीन डीवाइज (आई यू डी) और बिना स्टेरायड वाली गोलियां।
  • पांचवा तरीका है- भ्रूण को गर्भधारण और प्रतिरोपण के बाद निकाल देना। इसके उदाहरण हैं- गर्भपात करना या गर्भपात की गोलियां खाना।

इस प्रकार गर्भनिरोध के विभिन्न उपाय है जो विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग तरीके से काम करता है।  प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे उपायों को चुनना चाहिए जो उसके लिए उपयुक्त हो और उसके स्वास्थ्य या जीवन के लिए खतरा भी न हो।  इसके अतिरिक्त यह एक ऐसा भी निर्णय नहीं है जिसका पालन जीवन भर करना पड़े।

सही गर्भ-निरोधक उपायों को चुनने के लिए ध्यान देने योग्य बातें -

  • प्रभावकारिता अर्थात गर्भधारण के अवसर कितने हैं।
  • क्या गर्भ-निरोधक उपाय सुरक्षित हैं या फिर इसके गंभीर साइड एफेक्ट हैं।
  • क्या लंबी अवधि तक उपयोग करने पर इसके प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।
  • क्या इससे मां का दूध पिलाने पर कोई प्रभाव पड़ सकता है। क्या गर्भ-निरोध के उपाय का असर माँ के दूध पर प्रभाव डाल सकता है।
  • क्या इसका प्रभाव महिला द्वारा भविष्य में धारण किये जाने वाले बच्चे पर पड़ सकता है।
  • क्या गर्भनिरोधक के कोई विशेष परहेज हैं अर्थात जब महिला का नियमित रूप से खून जा रहा हो या जब पुनर्जनित सरणी (आर टी आई) संक्रमित हो तब क्या इसका उपयोग नहीं किया जाना है।
  • क्या गर्भ-निरोधक के उपयोग का नियंत्रण उपयोक्ता के हाथ में है या फिर स्वास्थ्य सेवक के हाथ में।
  • प्राकृतिक पद्धति ( लिंग को योनि के संपर्क में न आने देना विशेषकर जब उर्वरक के दिन हों)

गर्भधारण न होने देने के लिए सबसे सुरक्षित और आसान तरीका है कि संभोग ही न किया जाए। इसके बाद जो सबसे अच्छा तरीका है कि लिंग को योनि के संपर्क में न आने दिया जाए। ऐसा करने पर भी संभोग में उतना ही आनंद का अनुभव होता है।

लय (कैलेंडर) पद्धति

इस पद्धति के अनुसार महिला का उर्वरक समय मासिक-चक्र के आरंभ होने के बाद से 10 दिन रहता तक है। अतः इन 10 दिनों में संभोग नहीं किया जाना चाहिए। मासिक धर्म के आरंभ होने के पहले और बाद के सप्ताह को सुरक्षित अवधि समझी जाती है। लेकिन यह विश्वसनीय नहीं है क्योंकि यह मासिक धर्म के चक्र में होने वाले परिवर्तन को हिसाब में नहीं लेता। लय-पद्धति में यह माना जाता है कि महिलाओं में 28 दिन का चक्र होता है और माह के मध्य में डिंब बनने की प्रक्रिया आरंभ होती है। तथापि, प्रत्येक महिला का चक्र अलग-अलग होता है और डिंब बनने की प्रक्रिया अलग-अलग समय में आरंभ होती है। किसी भी पद्धति को न अपनाने की तुलना में यह पद्धति थोड़ी बेहतर है।

सर्वाइकल म्यूकस/बाइलिंग ओव्यूलेशन पद्धति-
 अधिकतर महिलाओं में महीने के अधिकांश समय योनी से स्राव होता रहता है।  यह स्वस्थ संकेत है।  इस म्यूकस की मात्रा, निरंतरता और रंग अलग अलग महिलाओं में अलग-अलग होता है।  यह कभी कभी चिपचिपा और सफेद रंग का भी होता है।  कभी-कभी यह फिसलनयुक्त और पारदर्शी होता है।  म्यूकस की प्रकृति मासिक-धर्म के स्तर के अनुसार बदलती रहती है।  मासिक धर्म के तुरंत बात यह म्यूकस थोड़ा, सूखा, गाढ़े टुकड़े तथा सफेद होता है।  जैसे-जैसे डिंब किसी गर्भाशय में बढ़ने लगता है, शरीर में रहने वाले हार्मोन एस्ट्रोजोन इस म्यूकस को पारदर्शी बनाने के साथ इसे पसारता है तथा यह चिपचिपा हो जाता है।  डिंबोत्सर्ग और इसके एक दिन के बाद यह चिप-चिपापन व विस्तारन अधिकतम होता है और इस प्रकार योनी से निकलने वाला यह चिप-चिपापन व विस्तारन महिला के उर्वरक दिनों की स्पष्ट और पहली निशानी है।  कोई भी महिला उसी दिन उंगलियों में इस सर्वाइकल म्यूकस को लेकर इसमें हुए परिवर्तन को देखकर अपने उर्वरक तथा अनुर्वरक दिनों का पता कर  सकती है।

शरीर का मूल तापमान- महिला को हर रोज सुबह-सुबह सो कर उठने के तुरंत बाद एक नियत समय में अपने शरीर का तापमान लेना होता है जिसे शरीर का मूल तापमान कहा जाता है।  महीने के मध्य में डिंबोत्सर्ग के दौरान इस तापमान में उल्लेखनीय रूप से वृद्धित होती है (लगभग 1-2 डिग्री फैरेनहाइट) और अगले मासिक-धर्म तक यह बना रहता है।  यदि केवल इसी पद्धति का उपयोग किया जाता है तो यह जरूरी है कि तापमान बढ़ने से पहले तक की पूरी अवधि में अर्थात लगभग 1-16 दिनों तक जननेंद्रियों का संपर्क न हो। एक बार डिंबोत्सर्ग हो जाने के बाद दूसरा 2 दिन उर्वरक माना जाता है।  इस प्रकार संभोग के लिए सुरक्षित दिन काफी कम रह जाते हैं।  इसके अतिरिक्त हर रोज तापमान लेने की पद्धति इसे और जटिल बनाती है।



अवरोध पद्धति

  ऐसी पद्धति जिसमें अंडे को वीर्य के संपर्क में नहीं आने दिया जाता।  अवरोध पद्धति वास्तव में वीर्य और अंडे के बीच अवरोध है।  निम्नलिखित अवरोध आजकल प्रचलन में हैः

पुरुष कंडोमः यह रबड़ का बना होता है जिसे पुरुष द्वारा संभोग के दौरान अपने लिंग के ऊपर पहना जाता है।  यह वीर्य को योनि के भीतर जाने से रोकता है।  योनि और लिंग के संपर्क से पहले खड़े लिंग पर इसे खोला जाता है क्योंकि वीर्य निकलने से काफी पहले कुछ ऐसी बूंदे निकल सकती है, जिसमें शुक्राणु हो सकते हैं या यौन जनित बीमारी (एस.टी.डी) की बीमारी फैल सकती है।  वीर्य निकलने के बाद योनि से लिंग को बड़ी सावधानी से निकाला जाना चाहिए ताकि वीर्य कंडोम से बाहर निकलकर योनि में या उसके आस-पास गिर न जाए। एक कंडोम को एक बार से ज्यादा उपयोग में न लाया जाए। पुरुष कंडोम गर्भ-निरोधक का सबसे प्रभावी और सुरक्षित उपाय है। पुरुष या महिला पर इसका कोई अतिरिक्त प्रभाव भी नहीं पड़ता।  कंडोम एड्स और यौन-जनित बीमारियों को रोकने का प्रभावी जरिया भी है।  कंडोम का उपयोग दो बच्चे के अंतराल के लिए भी किया जा सकता है। कंडोम सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला गर्भ-निरोधक है।
कुछ व्यक्तियों को, विशेषकर पुरुषों को ऐसा लगता है कि कंडोम से संभोग में वह लय और आनंद नहीं मिलता जितना कि मिलना चाहिए।  कुछ लोगों को लेटेक्स रबड़ से एलर्जी होती है। यदि कंडोम की गुणवत्ता खराब हो या उसे काफी दिन पहले तैयार करके रखा गया हो, विशेषकर गर्म स्थान में, तो उसके फटने या इसमें से रिसाव की संभावना अधिक होती है।  संभोग के दौरान यदि पर्याप्त मात्रा में स्नेहन न हो या कंडोम का उपयोग सही ढंग से न किया गया हो, तो भी यह फट सकता है। उदारहण के लिए जब कंडोम को संभोग के बाद खोला जाता है तो इसे बड़ी सावधानी से खोला जाना चाहिए।

डायाफ्रामः 19वीं सदी में डायफ्राम का आविष्कार किया गया था।  इसके द्वारा महिला अपने उर्वरकता को नियंत्रित कर सकती है।  डायाफ्राम गोल गुंबद के आकार वाली ठोस रिम के साथ रबड़ की चकती होती है जिसे गर्भाशय के मुंह को बंद करके शुक्राणु को उसमें न जाने देने के लिए योनि में डाला जाता है।  आरंभ में डायाफ्राम डॉक्टर/स्वास्थ्य कर्मचारी द्वारा लगाया जाता है क्योंकि डायाफ्राम 2 से 4 इंचों के माप में उपलब्ध है।  यह ऊपरी योनि के माप पर निर्भर करता है।  एक बार सही माप वाला डायाफ्राम लगा दिए जाने के बाद महिला स्वयं आवश्यकतानुसार इसे निकाल या डाल सकती है।  संभोग करने से पहले इसे कम से कम छह घंटे बाद निकालना चाहिए ताकि शुक्राणुनाशक उन शुक्राणुओं को मार सके जो योनि में रह गए हों।  इसके बाद इसे निकालकर साबुन और पानी से अच्छी तरह धोकर तथा उसे अच्छी तरह सुखाकर रखना चाहिए।

लेकिन इसके उपयोग में एक समस्या है। कभी कभार डायाफ्राम अपने आप आगे की ओर खिसक जाता है जिससे गर्भाशय या मूत्रमार्ग के ब्लाडर में खींचाव आ जाता है।  किसी-किसी महिला के मूत्रमार्ग में दर्द होता है या फिर बार-बार सिस्ट बनने लगता है।  अतः ऐसी महिलाओं द्वारा इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए जिनके मूत्र-मार्ग में अक्सर संक्रमण होता हो या जिनका गर्भाशय बढ़ा हुआ हो।  तथापि इसका एक विशेष लाभ है कि यह पूरी तरह महिला के नियंत्रण में होता है।  डायाफ्रम भारत में आसानी से नहीं मिलता।  कुछ महिला संगठनों द्वारा इसे आयात करके वितरित करने का प्रयास किया गया है।  एक डायाफ्राम की लागत लगभग 400/- रुपये है।  आरंभ में इसकी लागत थोड़ी अधिक होने के बावजूद यह नहीं भूलना चाहिए कि डायाफ्राम को बार-बार उपयोग में लाया जा सकता है और यदि इसे अच्छी तरह रखा जाए तो यह तीन से चार साल तक काम करता है।

गर्भाशय कैपः यह थिंबल के आकार का रबड़ का कैप होता है जिसे सुरक्षित रूप से गर्भाशय के ऊपर लगाया जाता है। डायाफ्राम की तरह गर्भाशय कैप भी वीर्य को गर्भाशय में जाने नहीं देता।  कैप को इस तरह बनाया गया है कि यह गर्भाशय के मुख को इस तरह बंद कर देता है कि हवा भी भीतर नहीं जा सकती।  सक्शन और सतही तनाव के कारण यह गर्भाशय में नजदीकी रूप से चिपके रहता है।  दुर्भाग्यवश गर्भाशय कैप भारत में उपलब्ध नहीं है।

महिला कंडोमः महिला कंडोम नरम व ढीला-फिट किया हुआ आवरण है जिसे पोलीयूरीथेन से बनाया जाता है। इसका एक सिरा बंद होता है। यह निकले वीर्य को योनि में जाने से रोकता है।  इस कंडोम को संभोग से पहले योनि में डाला जाता है।  इसके दोनों सिरे पर लचीला पोलीयूरीथेन छल्ला लगा होता है।  एक छल्ला उस बंद सिरे पर होता है जो गर्भाशय को ढकता है और दूसरी खुले सिरे पर जो योनि के बाहर रहता है।  योनि के बाहर वाला छल्ला महिला कंडोम में अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है।  यह भगोष्ठ (लेबिया) और लिंग के आधार के बीच अवरोधक का काम करता है।  संभोग से पहले महिला कंडोम को डाल लिया जाना चाहिए।  संभोग के बाद बड़ी सावधानी से इसे निकाला जाना चाहिए ताकि ऐसा न हो कि वीर्य निकलकर योनि में गिर जाए। महिला के खड़े होने से पहले इसे निकाला जाना चाहिए।  महिला कंडोम में कंडोम और डायाफ्राम की विशिष्टियां होती हैं।  इसे योनि में उसी प्रकार डाला जाता है जिस प्रकार कि डायाफ्राम को।  डायाफ्राम की तरह इसमें गर्भाशय को सीधे ढकने के कारण इसपर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। पुरुष कंडोम की तरह महिला कंडोम को उपयोग भी केवल एक बार करना चाहिए।

महिला कंडोम न केवल योनि के संस्तरों को ढकता है बल्कि गर्भाशय को भी पूरी तरह ढक लेता है। अतः पुरुष कंडोम की तरह यह गर्भ को रोकने के लिए न केवल एक प्रभावी गर्भ-निरोधक है बल्कि एच.आई.वी और यौन-जनित बीमारी से भी यह पूरी तरह सुरक्षित रखता है। इसका अन्य लाभ है - संभोग से पहले इसे डाला जा सकता है ताकि संभोग में कोई बाधा न पड़े। यह मानक माप में होता है और इसे डॉक्टर द्वारा लगाये जाने की आवश्यकता नहीं है। इसकी सबसे बड़ी हानि यह है कि इसकी कीमत बहुत अधिक है। साथ ही, संभोग के समय इससे एक ऐसी आवाज आती है जिससे चिड़-चिड़ापन आ जाता है।  मुख-मैथुन में आनंद नहीं आता।  चूंकि यह भग्न-शिश्न (क्लिटोरिस) के बाहर भी रहता है अतः कई महिलाएं यह मानती हैं कि इससे उन्हें संभोग में उतना आनंद नहीं आता।  इससे उनको असुविधा होती है। महिला कंडोम भारत में तैयार नहीं किया जाता।  इसे कार्यरत स्वैच्छिक संस्थानों से प्राप्त किया जा सकता है। 

शुक्राणुनाशकः शुक्राणुनाशक एक रसायन होता है जिसे योनि में लगाया जाता है। यह शुक्राणुओं को या तो निष्क्रिय कर देता है या फिर उन्हें मार देता है। यह फोम, गोली (उदाहरण के लिए टुडे), जेली या क्रीम (उदाहरण के लिए डेलफेन) के रूप में मिलता है।  शुक्राणुनाशक योनि में लागक (एप्लीकेटर) से संभोग से पहले लगाना चाहिए। इसे सामान्यतः अपने-आप से उपयोग में नहीं लाया जाता लेकिन कंडोम या डायाफ्राम की प्रभावकारिता को बढ़ाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।  यदि इन शुक्राणुनाशक को ही उपयोग में लाया जाता है तो इसकी निम्नतम प्रत्याशित असफलता दर 6 प्रतिशत है जबकि विशिष्ट मामलों में इसकी असफलता दर 26 प्रतिशत है।  इन शुक्राणुनाशकों के सामान्यतः कोई गंभीर अतिरिक्त परिणाम नहीं होते लेकिन कुछ महिलाओं में सूजन या एलर्जी की प्रतिक्रियाएं देखी गई है।



परंपरागत पद्धतियाँ

स्तन-पानः बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में मासिक-धर्म और डिंबोत्सर्ग की प्रक्रिया आरंभ होने में कुछ समय लग जाता है। कई महिलाओं में इसमें कुछ महीने भी लग जाते हैं।  मासिक-धर्म न होने पर स्तन-पान की इस अवधि को स्तन पान ऋतुरोध (लैक्टेशनल अमेनोरिया) कहा जाता है।  जब तक महिलाएँ स्तन-पान कराती रहती है अर्थात बच्चे को ऊपरी आहार न देकर रात और दिन बच्चे की मांग पर केवल स्तन-पान कराती है तो यह ऋतुरोध लंबे समय तक के लिए रहता है।  ऋतुरोध के दौरान गर्भधारण की संभावनाएं कम रहती है  तथापि पहले  मासिक धर्म से पहले डिंबोत्सर्ग होने लगता है, अतः यह भी संभव है कि मासिक-धर्म न होने पर फिर से गर्भ ठहर जाए।

संभोग भंग/निकासीः  इस पद्धति में, वीर्यपात से ठीक पहले योनि से लिंग को बाहर निकाल लिया जाता है ताकि शुक्राणु योनि में जमा न हो सके।  निकासी कोई प्रभावी पद्धति नहीं है क्योंकि निकास का समय गलत हो सकता है और योनि और योनि तट के संपर्क को टालना मुश्किल हो सकता है।  इसके अतिरिक्त लिंग के खड़े होते ही थोड़ा बहुत शुक्राणु निकलने लगता है जो गर्भ धारण के लिए पर्याप्त है।

उर्वरण की रोकथाम पद्धति

गर्भाशय संबंधी भीतरी उपस्कर (आई यू डी): आई यू डी सामान्यतः एक छोटा लचीले प्लास्टिक का उपकरण है, जिसे गर्भाशय में लगाया जाता है। अधिकतर उपकरणों में तांबा या संश्लिष्ट प्रोगेस्ट्रोन होता है।  आई यू डी महिला के गर्भाशय में गर्भाशय के मुख से डाला जाता है। एक बार गर्भाशय में आई यू डी डाल देने के बाद डोरियां (सामान्यतः दो) ऊपरी योनि तक जाती है।  योनि में उंगली डालकर डोरियों को छूने से यह पता चलता है कि आई यू डी अपने स्थान पर है या नहीं।  आई यू डी का कार्यचालन अभी भी पूरी तरह समझ में नहीं आया है।  आई यू डी (विशेषकर जिसमें तांबा होता है) से गर्भाशय में सूजन आ जाती है या गर्भाशय में हमेशा छोटा मोटा संक्रमण रहता है।  ये परिवर्तन शुक्राणुओं का नाश करते हैं या फिर महिला के योनि मार्ग के संचलन के साथ मिलकर उर्वरण को असंभव बनाते है। आई यू डी डिंब के संचलन की गति को भी डिंबवाही नलिका में बढ़ाते हैं जिससे डिंब गर्भाशय में बहुत पहले आ जाता है और शुक्राणुओं से मिल नहीं पाता।  यदि फिर भी उर्वरण हो जाता है तो बाहरी वस्तु द्वारा पहुंचाई गई बाधा से गर्भाशय में यह ठहर नहीं पाता।
भारत में आजकल सबसे ज्यादा कॉपर-टी का इस्तेमाल होता है। इन आई यू डी का उपयोग दो या तीन वर्ष तक के लिए किया जाता है और फिर इसके बाद इसे बदलना पड़ता है।  आई यू डी को मासिक धर्म की अवधि के दौरान या इसके तत्काल बाद डॉक्टर द्वारा गर्भाशय में डाल दिया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतर्वेशन के समय गर्भ ठहरा हुआ नहीं था।  गर्भ निरोधक के रूप में आई यू डी काफी प्रभावी है  तथापि इसके कुछ अतिरिक्त परिणाम भी है जिनमें से कुछ हैं-

  • अंतर्वेशन के पहले तीन से पांच दिन तक काफी खिंचाव और दर्द रहता है।
  • मासिक-धर्म के दौरान काफी खून जाता है या दो मासिक-धर्म के बीच भी खून जाता है जिसमें खून की कमी की संभावना बनी रहती है।
  • किसी-किसी मामले में गर्भाशय में छेद हो जाता है। यदि आई यू डी के चारों ओर गर्भाशय का संस्तर उगता है तो आई यू डी के विकृत होने की भी संभावना रहती है।  विकृत आई यू डी को निकालने में काफी दर्द होता है। कभी-कभी तो डी एंड सी (विस्तारण व खुरचन) की आवश्यकता पड़ जाती है।
  • श्रोणि सूजन बीमारी (पी आई डी) गर्भाशय मार्ग संस्तरण, गर्भाशय की भित्ती, फैलोपियन ट्यूब, डिंबाशय, गर्भाशय झिल्ली, गर्भाशय के चौड़े स्नायु या श्रोणि भित्ती को संस्तरण करने वाले झिल्ली, में होने वाला संक्रमण है। यह गोनोरिया और क्लेमेडिया जैसे संक्रामक घटकों के विभिन्न प्रकारों से होती है।  आई यू डी का उपयोग करने वाली महिलाओं में इसका खतरा कोई निरोधक उपयोग न करने वाली महिला के अनुपात में दुगुना हो जाता है।
  • गर्भाशय गर्भधारण, आई यू डी का उपयोग करने वाली महिलाओं में अधिक होता है (तांबे के आई यू डी का उपयोग करने वालों के बीच यह 3 प्रतिशत है)। गर्भाशय के बाहर गर्भधारण (गर्भाशय के बाहर गर्भधारण होना जो सामान्यतः फैलोपियन ट्यूब में होता है) एक गंभीर समस्या है जिसमें रक्त स्राव हो सकता है और रक्त स्राव से संक्रमण, बांझपन तथा कभी-कभी मृत्यु हो सकती है (जब तत्काल चिकित्सा सेवा उपलब्ध न हो)।
  • आई यू डी को गर्भ निरोधक के रूप में काफी सोच-विचार के बाद चुनना चाहिए। यदि किसी को बच्चा न हुआ हो तो आई यू डी डलवाना ठीक नहीं है। यह उन महिलाओं के लिए भी उपयुक्त नहीं है जिनके जननांग में बार-बार संक्रमण होता है, जिनका गर्भाशय के बाहर गर्भधारण का इतिहास रहा है, जो भारी डिस्मेनोरिया से पीड़ित हो अर्थात् जिनको मासिक-धर्म के समय काफी दर्द होता हो या वे महिलाएं जिनमें खून की काफी कमी हो।

अधिकांश सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में प्रसव या गर्भपात के तुरंत बाद   आई यू डी डलवाने पर दबाव डाला जाता है जबकि यह काफी खतरनाक होता है।

बिना स्टेरॉयड वाली गोलियाँ - सेंटक्रोमनः भारत में यह सहेली या च्वायस 7 के नाम से बिकती है। बिना स्टेरॉयड वाली गोलियां डिंब को गर्भाशय में तेजी से ले जाते हैं।  यह तब भी काम करता है जब उर्वरण हो चुका होता है।  बिना स्टेरॉयड वाली गोलियों  को सरकार आदर्श गर्भ निरोधक के रूप में बढ़ावा दे रही है।  यद्यपि यह हार्मोन गोलियां नही है, तथापि यह महिला के शरीर में एस्ट्रोजन-प्रोजेस्ट्रोन प्रकार्य में परिवर्तन लाती है।  सेटक्रोमन किसी-किसी उपयोक्ताओं में गर्भाशय डिंब तैयार करता है।
गर्भपातः
गर्भाधान की पूरी अवधि से पहले गर्भ समाप्त करने की प्रक्रिया को गर्भपात कहते हैं।  इसमें गर्भाशय से भ्रूण को निकाल दिया जाता है।  स्वतः गर्भपात या अपने आप हो जाने वाले गर्भपात प्राकृतिक गर्भ समाप्ति की प्रक्रिया है।  प्रेरणात्मक गर्भपात को गर्भ की चिकित्सकीय समाप्ति (एम टी पी) कहते है।  गर्भ-निरोधक के उपयोग के बाद भी कभी-कभी गर्भ ठहर जाता है।  बलात्कार, व्यभिचार या जबरदस्ती किये गये संभोग से भी गर्भ ठहर सकता है।  ऐसी परिस्थिति में महिला गर्भपात कराने का निर्णय ले सकती है।  अनादिकाल से गर्भपात को परिवार नियोजन के साधन के रूप में अपनाया जाता रहा है।  बाहर से मालिश, कठोर शारीरिक श्रम, किसी धारदार वस्तु से गर्भाशय को खुरोचना, गर्भपात कराने वाली जड़ी-बूटी खाना आदि ऐसे कुछ उपाय थे जिससे महिलाएं अनचाहे गर्भ को समाप्त करने का प्रयास करती रही हैं।  कई समाजों ने गर्भपात पर धार्मिक प्रतिबंध भी लगा रखे हैं, क्योंकि इससे जान को खतरा रहता है।  यद्यपि कई देशों में अभी भी गर्भपात को अवैध घोषित किया हुआ है, तथापि विश्व भर में महिलाओं ने इसे विधि सम्मत, सुरक्षित, वहनयोग्य और सुगम गर्भपात को अधिकार के रूप में प्रतिष्ठित कराने का आंदोलन छेड़ रखा है।  प्रेरणायुक्त गर्भपात को गर्भ की चिकित्सकीय समाप्ति अधिनियम, 1972 के अंतर्गत वैधानिक बनाया गया है।  गर्भपात के दौरान भ्रूण और गर्भनाल को गर्भाशय-मुख से निकाला जाना है।  गर्भ के विभिन्न स्तरों के आधार पर गर्भपात की विभिन्न पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है -

  • चूषण (सक्शन): यह उन गर्भों के लिए उपयुक्त है जो 6 से 8 सप्ताह तक का हो। इसमें दोनली या ट्यूब के एक सिरे को चूषण पंप से जोड़ा जाता है और दूसरा सिरा गर्भाशय में डाला जाता है। इसे सामान्य (जनरल) या स्थानीय( लोकल) अनेस्थिशिया के अंतर्गत किया जाता है। चूषण की प्रक्रिया से भ्रूणात्मक ऊतकों (टिश्यू) को कुछ ही मिनटों में निकाल लिया जाता है। इसके लिए अस्पताल में रहने की आवश्यकता नहीं होती।
  • डी एंड सी (विस्तारण और खुरचन): 8 से 16 सप्ताह के गर्भ के लिए इसका उपयोग किया जाता है। गर्भाशय को एक तनुकार छड़ से चौड़ा किया जाता है और खुरचनी से गर्भाशय को खुरचकर साफ किया जाता है। इसे सामान्य अनेस्थिशिया के अंतर्गत किया जाता है।
  • प्रेरणात्मक प्रसवः 16 से 20 सप्ताह वाले उन्नत गर्भ के मामले में इस पद्धति का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः लवणीय, यूरिया या प्रोस्टाग्लेनडिन का घोल गर्भ थैली में डाला जाता है जिससे समय-पूर्व प्रसव से भ्रूण को निकाला जाता है। इसे स्थानीय अनेस्थिशिया के अंतर्गत किया जाता है और एक या दो दिन के लिए अस्पताल में रहने की आवश्यकता होती है।
  • गर्भपात की गोलियां: माइफप्रिस्टोन और मिसोप्रोस्टल औषधी के संयुक्त उपयोग से चिकित्सकीय गर्भपात संभव है। इसे भारत में वैध घोषित किया गया है। माइफप्रिस्टोन (जिसे आर यू 486 के नाम से भी जाना जाता है) गर्भपात निवारक गोली है जो अपने-आप में भरोसेमंद नहीं है। अतः इस गोली के लेने के 2 से 3 दिन बाद प्रोस्टोक्लेडीन (मिसोप्रोस्टल) गोली लेनी पड़ती है। आर यू 486, 6 से 8 सप्ताह वाले गर्भ के गर्भपात की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए ही प्रभावी है। गर्भपात की गोलियां चिकित्सकीय पर्यवेक्षण में ही ली जानी चाहिए क्योंकि इससे इतना खून निकलने लगता है कि नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। इसके और अतिरिक्त परिणाम है- उल्टी, मिचली और अत्यधिक मात्रा में खून गिरना जिससे मृत्यु भी हो सकती है। गर्भपात में 12 दिन लग सकते हैं और इन 12 दिनों में लगातार खून निकलते रहता है। चूंकि आर यू 486 गर्भ के शुरू-शुरू में प्रभावी होता है, अतः यह अभी तक पता नहीं चल पाया है कि यदि गर्भपात न हो, तो भ्रूण पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।




हार्मोनीय पद्धतिः

हार्मोनीय पद्धति में शरीर के हार्मोन, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन, को प्रभावित किया जाता है, जिससे डिंबोत्सर्ग या शुक्राणु उत्पादन को रोका जा सके। ये गर्भाशय के श्लेषमा (म्यूकस) को गाढ़ा करने में भी सहायक सिद्ध होती है (इससे शुक्राणु गर्भाशय में प्रवेश नहीं कर पाता)। किसी-किसी मामले में गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब में परिवर्तन भी होता है जिससे उर्वरण को रोका जा सकता है।  हार्मोनीय पद्धति से शरीर के हार्मोन का नाजुक संतुलन बिगड़ सकता है।  इसके गंभीर अतिरिक्त परिणाम हो सकते हैं।  इसका असर न केवल जननेन्द्रियों पर पड़ता है, बल्कि शरीर के अन्य भागों में भी देखा जा सकता है। इससे प्रणालीबद्ध तरीके से परिवर्तन होता है। सरकारी गर्भ-निरोधक संस्थाएं इसे आदर्श गर्भ-निरोधक के रूप में बढ़ावा देती हैं, क्योंकि ये काफी प्रभावी होते हैं और इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।

खाने वाली संयुक्त गर्भ-निरोधक गोलियां: खाने वाली विभिन्न प्रकार की गर्भ-निरोधक गोलियां इस प्रकार हैं-

खाने वाली संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियां: इसमें दो हार्मोन होते हैं- एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन। इसका अनुपात भिन्न-भिन्न होता है। ये गोलियां गर्भ ठहरने नहीं देती।  मूलतः, चक्र के आरंभ में एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर डिंबाशय में डिंब के विकास में ये गोलियां बाधा पहुंचाती हैं।  टूडे का उच्च खुराक वाली संयुक्त गोली (जैसे ओवरल) की तुलना में कम खुराक वाली संयुक्त गोली (जैसे माला डी) काफी सुरक्षित है।  यह देखा गया है कि खाने वाली संयुक्त गर्भ निरोधक गोलियां सभी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है।

प्रोजेस्ट्रोन -एक मात्र गोलीः खानेवाली संयुक्त गर्भ-निरोधक गोलियां डिंबोत्सर्ग को रोकती हैं, जबकि प्रोजेस्ट्रोन-एक मात्र गोलियां गर्भ को रोकती हैं। इससे श्रोणि श्लेष्मा (म्यूकस) बढ़ता है और शुक्राणुओं के साथ-साथ डिंबों के स्वाभाविक चाल की गति को कम करती है तथा गर्भाशय के संस्तरों को सही तरह से पनपने नहीं देती। इन गोलियों के कई लाभ है। उदाहरण के लिए प्रभावकारिता, सुविधा, निर्बाध संभोग और सिद्ध प्रत्यावर्तिता। लेकिन इसके कुछ अतिरिक्त परिणाम भी होते हैं, जिससे बचा जाना चाहिए।

गर्भ-निरोधक इंजेक्शनः डेपो प्रोवेरा (डेपो मैड्रोक्सी प्रोजेस्ट्रोन एसिटेट) और नेट एन (नोरेथिस्ट्रोन एनानथेट) एक मात्र प्रोजेस्ट्रोन इंजेक्शन वाला गर्भ निरोधक है। डेपो प्रोवेरा का प्रभाव तीन महीने तक रहता है और नेट एन का दो महीने तक।

परिवार नियोजन के लिए इंजेक्शन सुविधाजनक पद्धति है। इन इंजेक्शनों से थोड़े समय के साथ-साथ लंबे समय तक के अतिरिक्त परिणाम होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।  इसे भारी मात्रा में दिए जाने के परिणामस्वरूप इसका प्रभाव लंबी अवधि तक रहता है और इसके अतिरिक्त परिणाम गोलियों की तुलना में काफी अधिक होते हैं। महिला के चाहने पर भी इसके प्रभाव को दो-तीन महीने के भीतर रोकना संभव नहीं होता।  इस समय राष्ट्रीय परिवार कल्याण कार्यक्रमों में इसे शामिल करने के लिए इन इंजेक्शनों के उपयोग को लाइसेंस नहीं दिया गया है।  इसे 1994 में निजी व्यवसायकर्ता तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा "सामाजिक बाजार" के लिए निबंधित किया गया है।

प्रोजेस्ट्रोन-एक मात्र इंजेक्शन के उपयोग से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी खतरेः

  • लंबी अवधि के स्पॉटिंग और अत्यधिक खून बहाव से लेकर खून बंद होने की प्रक्रिया समाप्त होने तक मासिक धर्म में गड़बड़ी।
  • एथरोस्लेरोसिस - रक्त नलिका का मोटा होना और हृदय की नसों से संबंधित बीमारी।
  • थ्रम्बोइम्बोलिज़्म-अप्रत्याश्ति स्थान पर खून का जमा होना जिससे दिल, फेफड़ा और मस्तिष्क आदि खराब होना।
  • ओस्टियोपोरोसिस/हड्डी के घनत्व में हानि जिससे अस्थि भंग होने के अधिक अवसर।
  • वजन में परिवर्तन
  • अन्य उपापचय (मेटाबोलिज़्म) परिवर्तन जिससे सर्करा, उदासी, थकावट, संभोग की इच्छा आदि में परिवर्तन
  • उर्वरकता की वापसी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता (अंतराल पद्धति में गंभीर समस्या)
  • कैंसर का खतरा हमेशा बना रहता है।
  • भ्रूण पर विपरीत प्रभाव (आकस्मिक गर्भाधान के मामले में)

आकस्मिक गर्भ-निरोधक गोली अथवा मॉर्निंग आफ्टर गोली -
असुरक्षित यौनि संबंध बनाने के पश्चात आकस्मिक गर्भ निरोधक की खाने वाली गोलियां खाकर गर्भाधारण रोका जा सकता है। यह उन स्थितियों में विशेष रूप से प्रासंगिक है जब किसी महिला के साथ उसकी मर्जी के खिलाफ संभोग किया गया हो (बलात्कार), कंडोम फट गया हो अथवा योजना रहित संभोग किया गया हो। असुरक्षित संभोग क्रिया के बाद 72 घंटे (3 दिन) तक ही आपाती गर्भ निरोधकों का प्रयोग किया जा सकता है। चार मानक खुराकें अथवा कम मात्रा की खुराक। आपाती गर्भ निरोधक के लिए माला-डी या माला-एन जैसी खाने वाली गर्भ निरोधक गोलियों का प्रयोग किया जा सकता है। परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत लेवेनोजेस्ट्रल औषधि से बनी एक मार्निंग आफ्टर गोली को भी शामिल किया गया है जिसमें से दो गोलियां असुरक्षित संभोग से चार दिन के अंदर प्रयोग कर लेनी चाहिए।

इसके अतिरिक्त परिणामस्वरूप मिचली व उल्टी होती है और अगली माहवारी अवधि अनियमित हो जाती है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि आपाती गर्भ-निरोधक किस प्रकार कार्य करता है। ऐसा माना जाता है कि इससे डिंबक्षारण रोका जा सकता है तथा यदि पहले से ही डिंबक्षारण हो चुका हो तो इससे प्रजनन शक्ति भी तितर-बितर हो जाती है। तथापि यह 100 प्रतिशत प्रभावी नहीं है। माहवारी के दूसरे और तीसरे सप्ताह के दौरान एक असुरक्षित संभोग करने से औसतन 8 प्रतिशत गर्भ धारण की संभावना रहती है तथा आपाती गर्भ-निरोधक प्रयोग करने के पश्चात यह घटकर 2 प्रतिशत तक रह जाती है।
यहां यह याद रखना बहुत जरूरी है कि आपाती गर्भ निरोधकों का प्रयोग करना कारगर साबित नहीं होता है, तो भ्रूण में खराबी आने की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है। अतः आपाती गर्भ निरोधकों का प्रयोग करते समय अत्यंत सतर्क रहना जरूरी है तथा सुनिश्चत करें कि गर्भपात की कानूनी और सुरक्षित परामर्श की समुचित व्यवस्था हो।



स्थायी उपायः

पुरुषों और महिलाओं में स्थायी उपायों के लिए उनके अंडे/शुक्राणु प्रवाहित करने वाली ट्यूब अवरुद्ध करने या काटने की आवश्यकता होती है। नई चिकित्सा तकनीक के अनुसार, पुनः प्रवाह मार्ग क्रिया (ट्यूब को फिर से जोड़ना) अपनाई जाती है किंतु यह सदैव संभव हो या सफल सिद्ध हो, यह जरूरी नहीं है। अतः ये तरीके सभी व्यावहारिक प्रयोग के लिए अपरिवर्तनीय है। बन्ध्याकरण बहुत ही अधिक प्रभावी है। अतः उन लोगों के लिए उपयुक्त है जिनमें परिवार नियोजन की भावना जाग चुकी हो और आश्वस्त हों कि उनको और अधिक बच्चों की आवश्यकता नहीं है।

1. वासेक्टोमी/पुरुष बन्ध्याकरणः
वासेक्टोमी, पुरुषों के लिए शल्य क्रिया द्वारा बन्ध्याकरण प्रक्रिया है। इस क्रिया से पुरुषों की वाहक नलिका अवरुद्ध कर दी जाती है जिससे कि शुक्राणु वीर्य के साथ पुरुष लिंग तक न पहुंच सकें। पुरुष, तथापि वीर्य को छोड़ना जारी रखता है तथा इससे उसकी संभोग क्रिया में किसी भी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है। पुरुष को उसकी मर्दानगी और संभोग कार्य निष्पादन के विषय में चिंता से मुक्त होने के लिए पर्याप्त तथा सचेतन परामर्श की आवश्यकता हो सकती है। नश्तर बिना बन्ध्याकरण के मामले में अंडकोश की थैली के दोनों ओर एक मामूली सा छेद किया जाता है जिससे "वास डेफरन" बाहर आ जाता है जिसे या तो काट दिया जाता है, बांध दिया जाता है या फिर उस पर क्लिप लगा दिया जाता है। इसके लिए स्थानीय अनेस्थीसिया दिया जाता है। बन्ध्याकरण एक मामूली तथा साधारण सी शल्य क्रिया है किंतु पुरुषों को शल्यक्रिया के पश्चात कम से कम 48 घंटे आराम करना होता है तथा एक सप्ताह तक उन्हें कोई भारी सामान नहीं उठाना चाहिए। व्यक्ति को मैथुन क्रिया सभी प्रकार का दर्द बंद होने तथा किसी भी मामले में एक सप्ताह के बाद ही आरंभ करनी चाहिए। शल्य क्रिया के बाद 2 से 3 महीने तक वैकल्पिक परिवार नियोजन के उपाए अपनाना चाहिए, क्योंकि वीर्य अपने वीर्य डक्ट में 3 महीने तक रह सकता है। यदि शल्य क्रिया के बाद तेज बुखार, अधिकाधिक या लगातार रक्त स्राव, सूजन या दर्द होता हो, तो तत्काल डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। पुरुष का बन्ध्याकरण करना सुरक्षित और आसान है क्योंकि पुरुष का लिंग, महिला की तुलना में बाहर होता है। अतः बन्ध्याकरण के समय शारीरिक अंगों के साथ कम से कम छेड़ छाड़ करनी पड़ती है तथा जटिलता भी कम से कम होती है। इसके अतिरिक्त, बन्ध्याकरण क्रिया से कोई अन्य लंबी अवधि के खतरे नहीं जुड़े होते है।

2. ट्यूबेक्टोमी/महिला बन्ध्याकरणः
इस प्रक्रिया के अंतर्गत महिला के उदर में एक छोटा सा छेद करना पड़ता है जिससे कि महिला के फैलोपियन ट्यूब तक पहुंचा जा सके। फिर उसको काट कर बांध दिया जाता है या ढक दिया जाता है। यह स्थानीय एनेस्थेसिया देकर किया जा सकता है। महिला के अंदर का फैलोपियन ट्यूब ब्लाक कर दिया जाता है जिससे कि अंडाशय में उत्पन्न अंडे, शुक्राणुओं के साथ मिल न सके। सही तरीके की शल्यक्रिया करने पर महिला बन्ध्याकरण बहुत ही प्रभावी सिद्ध होता है। इसमें जटिलताएं पैदा हो सकती हैं तथा होती भी हैं। संक्रमण, आंतरिक रक्त स्राव, बच्चेदानी और/या अंतड़ियों में छिद्र हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप हृदय संबंधित समस्याएं, अनियमित रक्तस्राव, माहवारी के दौरान काफी तकलीफ देने वाला दर्द और बार-बार डी एंड सी करने की आवश्यकता अथवा जननेन्द्रिय थैली तक निकालने की आवश्यकता होती है। ऐसे मामले में तत्काल डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। बन्ध्याकरण क्रिया के पहले तथा बाद में समुचित सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। शल्य क्रिया के बाद कम से कम 48 घंटे आराम की आवश्यकता होती है। सामान्य क्रियाकलाप 2 या 3 दिन के बाद आरंभ किए जा सकते हैं किन्तु एक सप्ताह तक कोई भारी सामान नहीं उठाना चाहिए। संभोग क्रिया सामान्यतौर पर एक सप्ताह के बाद आरंभ की जा सकती है।






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