आपदा व आपात स्थिति मुख्य संदेश-4
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घर या बाहर में होने वाली हिंसा या विवाद बच्चों में भय का निर्माण कर सकते हैं। जब ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती है, तब बच्चों की ओर विशेष ध्यान देना ज़रूरी है। उन्हें अतिरिक्त प्रेम देना, उनकी अनुभूतियों को सुनना व समझना आवश्यक होता है। जब आपके अपने स्थान, वस्तुएं आपके साथ नहीं रहते या भय का वातावरण होता है, तब वयस्क भी अपना स्वभाव भूल जाते हैं या भयाक्रांत रहते हैं। ऐसे में बच्चे भी डर के साये में जीते हैं। आपदा की स्थिति में अभिभावकों के लिये अपने बच्चों को प्रेम व सुरक्षा की अनुभूति देना बड़ा मुश्किल होता है। किसी लड़ाई या दर्द भरे हिंसात्मक अनुभव के बाद, यह संभव है कि बच्चों में तनाव की अभिव्यक्ति के लक्षण दिखाई दें। कुछ बच्चे एकदम अंतर्मुखी हो जाते हैं तो कुछ अचानक हिंसात्मक हो उठते है। कुछ बच्चे अपने डर को मन में रखते हुए भी काफी अच्छे ढंग से व्यवहार कर लेते है। संभव है कि बच्चे लंबी चलने वाली हिंसा के आदी हो जाए लेकिन ये बात उन्हें तकलीफ अवश्य देती हैं। यदि बच्चों को कोई समझने वाला भी न मिलता तो वे और ज्यादा दुखी हो सकते हैं। नियमित दिनचर्याः रोजाना समय पर स्कूल जाना, समय पर खाना और खेलने जैसा नियमित दिनचर्या बच्चों को सुरक्षा देता है। बच्चों को मनोरंजक गतिविधियों के ज़रिये भी उसके तनाव को दूर किया जा सकता है। ऐसी कुछ व्यवस्था की जा सकती है कि शरणार्थी शिविरों में कोई स्थान सुरक्षित व संवाद भरे खेलों के लिये रखा जाए जिससे बिना किसी तनाव के सभी पीड़ित परिवारों के बच्चे वहां आकर खेल सके। चित्रकारी व खिलौनों के साथ खेलना व कठपुतलियों का प्रदर्शन भी बच्चों को अपने मन का डर दूर करने में सहायक होते हैं। अपने साथ हुई घटना को भुलाने का, ये बच्चों का तरीका होता है। बच्चों को ये कहने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये कि उन्हें किस चीज़ के कारण तकलीफ हो रही है। उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिया जाना चाहिये परंतु इस बात का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिये। उन्हें पहले कुछ सुनाया जाए तो वे आसानी से कह सकते हैं कि उन्हें क्या महसूस हो रहा है। 3 से 6 वर्ष के बीच के बच्चे किसी घटना के उत्तरदायित्व को समझते हैं। इस विचार के चलते उनमें अपराध की भावना घर कर सकती है। इस प्रकार के बच्चों को वयस्कों का साथ व सहारा चाहिये होता है। बच्चों को बार-बार आश्वासन की ज़रूरत होती है, उन्हें डांटा या सज़ा नहीं दी जानी चाहिए। यदि किसी नज़दीकी रिश्तेदार को दूर जाना पड़ रहा हो, तब बच्चे को पहले से ये बात बताई जानी चाहिये। बच्चे को बताया जाना चाहिये कि वह व्यक्ति कहां जा रहा है व उसकी अनुपस्थिति में उसकी देखभाल कौन करने वाला है। चूंकि किशोर होते बच्चों में किसी भी युद्ध अथवा आपदा की बेहतर समझ होती है, उनमें अपराध भावना बलवती होती है कि वे इस घटना को होने से रोक नहीं पाये। ऐसे में उन्हें संभालना और भी मुश्किल हो सकता है। संभव है कि वे सामान्य व्यवहार कर रहे हों परंतु इस प्रकार की स्थिति से उबरना उनके लिये मुश्किल होता है। किशोर उम्र में कई बार अत्यधिक उग्र अथवा अवसाद से भरा व्यवहार देखने को मिलता है। वे अधिकारियों के खिलाफ बगावत कर सकते हैं अथवा नशीली दवाईयों का सेवन, चोरी आदि कर सकते हैं या एकदम चुपचाप होकर परिस्थिति के समक्ष समर्पण भी कर सकते हैं। बच्चों को किशोर उम्र में, वयस्कों के साथ की, ज़रूरत होती है। समाज में उन्हें स्थान देना और सामूहिक गतिविधियों में सक्रिय बनाना काफी मदद कर सकता है। जो किशोर अपने परिवार पर अपेक्षाकृत कम निर्भर हैं, उन्हें उनके सहपाठी, शिक्षक व समाज के सदस्य इस प्रकार की स्थिति से उबरने में मदद कर सकते हैं। किशोरों को अपने अनुभवों के विषय में बोलने व विश्वास करने लायक वयस्कों के साथ अपने मन की बातें कहने का मौका दिया जाना चाहिये। उन्हें सामूहिक गतिविधियों में सक्रिय किया जाना चाहिये। यदि बच्चों की तनावपूर्ण स्थिती लंबे समय तक चलती रहे तो उन्हें विशेषज्ञ की सलाह की ज़रूरत होती है। |
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