बाल विकास और शुरुआती सीख मुख्य संदेश -1

 
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बाल विकास और आरंभिक अभ्यास
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पोषण और विकास
टीकाकरण
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सर्दी, जुकाम और अधिक गंभीर बीमारियाँ
स्वच्छता
मलेरिया
एचआइवी/ एड्स
जख्म से बचाव
आपदा और आपात स्थिति
सारांश

पहले आठ साल में, और खास कर पहले तीन साल के दौरान, बच्चे की देखभाल और ध्यान बहुत जरूरी है और इसका असर बच्चे के पूरे जीवन पर पड़ता है।

शुरुआती सालों में देखभाल और ध्यान बच्चों के फलने-फूलने में मदद देता है। बच्चों को थामना, गोद लेना और बातें करना उनकी बढ़त को उकसाता है। मां के करीब और भूखा होते ही उसे मां का दूध मिलना, बच्चे में सुरक्षा की भावना भरने का काम करता है। बच्चों को मां के दूध की जरूरत पोषण और सुख-चैन दोनों के लिए होती है।

लड़का हो या लड़की, दोनों की एक जैसी शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक जरूरतें होती हैं। सीखने की क्षमता दोनों में बराबर होती है। दुलार, ध्यान और बढ़ावे की जरूरत दोनों को होती है।

छोटे बच्चे रो कर अपनी जरूरतें बताते हैं। बच्चे के रोने पर तुरंत हरकत में आना, उसे उठाना और मजे से बातें करना उसमें विश्वास और सुरक्षा की समझ पैदा करेगा।

जिन बच्चों में खून की कमी हो, कुपोषित हों या बार-बार बीमार पड़ जाते हों, वे स्वस्थ बच्चों के मुकाबले डर और परेशानी का शिकार आसानी से हो सकते हैं और जो उनमें खेलने-कूदने, खोजबीन करने या दूसरों से मिलने-जुलने की चाहत का अभाव उत्पन्न करेगा।

ऐसे बच्चों को खाने-पीने के लिए विशेष ध्यान और बढ़ावे की जरूरत होती है।

बच्चों की भावनाएं सच्ची और ताकतवर होती हैं। अगर बच्चे कुछ कर पाने या जो अपनी पसंद की चीज पाने में असमर्थ हैं, तो वे कुंठित हो सकते हैं। बच्चे अक्सर अजनबी लोगों से या अंधेरे से डरते हैं। जिन बच्चों की हरकतों पर हंसा जाता है, उन्हें सजा दी जाती है, वे बड़े होकर शर्मीले और अपनी भावनाएं सामान्य रूप से रखने में असमर्थ हो सकते हैं। देखभाल करने वाले अगर बच्चों के मन की भावनाओं के प्रति धीरज और हमदर्दी रखा जाता है तो उसके प्रसन्नचित्त, सुरक्षित और संतुलित तरीके से बढ़ने की संभावना अधिक होती है।

शारीरिक सजा या हिंसा का प्रदर्शन बच्चे के विकास को नुकसान पहुंचा सकता है। गुस्से में जिन बच्चों को सजा दी जाती है, खुद उनके हिंसक होने की संभावना और बढ़ जाती है। स्पष्ट बात कि बच्चों को क्या करनी चाहिए, ठोस नियम कि क्या नहीं करनी चाहिए तथा अच्छे व्यवहार की शाबाशी, बच्चों को समुदाय और परिवार का खरा और उत्पादक हिस्सा बनाये जाने के कहीं अधिक कारगर तरीके हैं।

दोनों माता-पिता के साथ ही परिवार के दूसरे सदस्यों को भी बच्चों की देखभाल में शामिल किये जाने की जरूरत है। पिता की भूमिका खास तौर पर महत्वपूर्ण होती है। पिता प्यार, लगाव और उत्तेजना पाने की बच्चे की जरूरतें पूरी करने के प्रयास को सुनिश्चित कर सकता है कि बच्चे को अच्छी शिक्षा, अच्छा पोषण मिले और उसकी सेहत की सही देखभाल हो। पिता सुरक्षित और हिंसा से मुक्त वातावरण को भी सुनिश्चित कर सकता है। पिता घरेलू काम में भी हाथ बंटा सकता है, खास कर तब जब मां बच्चे को दूध पिला रही हो।

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