राष्ट्रीय किसान नीति- 2007

यह नीति कृषि क्षेत्र को फिर से सशक्त करने और किसानों की आर्थिक दशा सुधारने के उद्देश्य से बनाई गई है।

पृष्ठभूमिः                                                                              ऊपर

सरकार ने 2004 में किसानों पर राष्ट्रीय आयोग का गठन प्रो. एम.एस.स्वामीनाथन की अध्यक्षता में किया था। आयोग के गठन के पीछे देश के विविध कृषि-उत्पाद क्षेत्रों में अलग कृषि व्यवस्था में उत्पादन, लाभ और दीर्घकालिकता को बढ़ावा देने की सोच थी। साथ ही, ऐसे उपाय भी सुझाना था ताकि शिक्षित और युवावर्ग को खेती की तरफ आकर्षित कर उसे अपनाये रखने के लिए मनाया जा सके। इसके अलावा एक वृहद् मध्यम अवधि का रणनीति अपनाई जाए, ताकि खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके। आयोग ने अपनी अंतिम प्रतिवेदन अक्तूबर 2006 में सरकार को सौंपी।

आयोग द्वारा पुनरीक्षित किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति के प्रस्तावों और कई केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों और राज्य सरकारों की टिप्पणी/सुझाव के आधार पर भारत सरकार ने किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति -2007 की संकल्पना और मंजूरी दी। दूसरी बातों के अलावा यह नीति किसानों की आर्थिक दशा में उत्पादन, लाभ, पानी, जमीन और दूसरी सहायक सुविधाओं में इजाफा कर अहम बदलाव लाने का लक्ष्य रखती है। साथ ही, यह उचित मूल्य नीति व आपदा प्रबंधन जैसे उपाय भी करता है।

नीति की मुख्य बातें                                                              ऊपर

किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति 2007 की बातें और प्रावधान इस प्रकार हैं-

  1. मानवीय पक्ष- मुख्य जोर किसानों की आर्थिक दशा सुधारने पर रहेगा, न कि केवल उत्पादन और उत्पादकता केन्द्र में रहेगी और यह किसानों के लिए नीति निर्धारण की मुख्य कसौटी होगी
  2. किसानों की परिभाषा- यह क्षेत्र में संलग्न हर आदमी को शामिल करती है ताकि उनको भी नीति का फायदा मिल सके
  3. संपत्ति सुधार- यह सुनिश्चित करने के लिए कि गाँवों का हरेक पुरुष या महिला-खासकर गरीब- या तो उत्पादक संपत्ति का मालिक हो या उस तक पहुँच रखता हो
  4. जल की हरेक इकाई पर कमाई- पानी की हरेक ईकाई के साथ उपज को अधिकतम करने का विचार हरेक फसल के उत्पादन में अपनाया जाएगा। साथ ही, पानी के अधिकतम इस्तेमाल के बारे में जागरूकता फैलाने पर भी जोर दिया जाएगा।
  5. सूखा कोड, बाढ़ का कोड औऱ अच्छे मौसम का कोड- यह सूखा और बाढ़ग्रस्त इलाकों में लागू किया जाएगा, साथ ही, ऊसर इलाकों में भी इसे लागू किया जाएगा।  इसका उद्देश्य मॉनसून का अधिकतम लाभ उठाना और संभावित खतरों से निबटना है।
  6. तकनीक का इस्तेमाल- नयी तकनीक के इस्तेमाल से भूमि और जल की प्रति ईकाई उत्पादन को बढ़ाना है। जैव-प्रौद्योगिकी, संचार व सूचना प्रौद्योगिकी (आई.सी.टी), पुनरुत्पादन के लायक ऊर्जा तकनीक, आकाशीय तकनीक और नैनो-तकनीक के इस्तेमाल से एवरग्रीन रेवोल्यूशन (हमेशा हरित क्रांति) की स्थापना की जाएगी। इससे बिना पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाए उत्पादन को बढ़ाया जा सकेगा।
  7. राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा व्यवस्था- यह एक समन्वित कृषीय जैव-सुरक्षा कार्यक्रम की व्यवस्था के लिए स्थापित होगा।
  8. भूमि की देखभाल हेतु सेवाएँ और निवेश- अच्छी गुणवत्ता के बीज, रोगमुक्त रोपण सामग्री-जिसमें हरित गृह में उगाए बीज (इन-विट्रो प्रोपैग्युल)- और मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाकर छोटे खेतों की उत्पादकता बढ़ाई जाएगी। हरेक किसान परिवार को मिट्टी के गुणवत्ता की जानकारी देनेवाला पासबुक दिया जाएगा।
  9. महिलाओं के लिए सहायक व्यवस्था- जब महिलाएँ दिनभर जंगलों या खेतों में काम करती हैं तो उनको सहायक सुविधाएँ जैसे, क्रेचेज, पर्याप्त पोषण और बच्चों के देखभाल की जरूरत होती है।
  10. ऋण एवं बीमा- ऋण की सलाह देनेवाले केन्द्र वहाँ स्थापित किए जाएंगे, जहाँ भारी कर्ज में डूबे किसानों को ऋण राहत पैकेज दिया जाएगा, ताकि वे कर्ज के जाल से निकल सकें। ऋण और बीमा के बारे में जानकारी के लिए ज्ञान चौपाल स्थापित किए जाएंगे।
  11. खेतों में स्कूल की स्थापना की जाएगी ताकि किसान से किसान सीख सकें और प्रसार की सुविधा भी मजबूत की जा सके।
  12. किसानों के लिए समन्वित राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना- इससे किसानों को बीमारी और बुढ़ापे वगैरह में बीमा के जरिए आजीविका सुनिश्चित कराया जा सकेगा।
  13. न्यूनतम समर्थन मूल्य- पूरे देश में प्रभावी तरीके से ऐसी व्यवस्था की जाएगी, ताकि किसानों को कृषि उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।
  14. एकीकृत राष्ट्रीय बाजार- आंतरिक नियंत्रण और रोकों को हटाकर पूरे देश में एकीकृत बाजार की व्यवस्था
  15. खाद्य सुरक्षा को व्यापक बनाना-  जिसमें पोषक फसलों जैसे बाजरा, जवार, रागी और कोदो को भी शामिल किया जाएगा जो शुष्क भूमि में उगाए जाते हैं।
  16. भविष्य के किसान- किसान सहकारी खेती अपना सकते हैं, सेवा सहकारिता बना सकते हैं, स्वयं सहायता समूह के जरिए सामूहिक खेती कर सकते हैं, छोटी बचत वाली संपत्ति बना सकते हैं, निविदा खेती को अपना सकते हैं और किसानों की कंपनी बना सकते हैं। इससे उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, छोटे किसानों की क्षमता में बढ़ोतरी होने और कई तरह की आजीविकाओं के निर्माण की भी संभावना है। यह कृषि उत्पाद संशोधन और एकीकृत कृषि व्यवस्था के जरिए होगा।
  17. खाद्य सुरक्षा पर एक कैबिनेट समिति बनाई जाएगी

नीति के क्रियान्वयन की व्यवस्थाः                                         ऊपर

नीति के क्रियान्वयन के लिए कृषि और सहकारिता विभाग एक अंतर्मंत्रालयीय समिति का गठन किया जाएगा, जो इस ध्येय के लिए आवश्यक योजना बनाएगी। कृषि समन्वयन समिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति के एकीकृत क्रियान्वयन का समन्वय और समीक्षा करेगी।

किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति 2007 को राज्यसभा में 23 नवंबर 2007 और लोकसभा में 26 नवंबर 2007 को केन्द्रीय कृषि मंत्री श्री शरद पवार ने रखा।

पीआईबी विज्ञप्ति, 26 नवंबर 2007


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